“नवरात्र महोत्सव”
October 19, 2007
नौ दिन तक चलने वाले व्रतों का आज अंतिम व्रत है। कल नौवीं को कन्याओं को जिमाकर और उपहार देकर समापन हो जाएगा। यह मातृ-शक्ति की उपासना का पर्व है। संसार में माँ का छोटा रुप बालिका ही है इसलिए बालिका की आराधना होती है यही बालिका बड़ी होकर अन्य रुपों में दिखायी देती है। पर मूर्ति के साथ इसतरह से कन्या पूजा से तो अच्छा है कि उसे वास्तव में जीवन भर पूजा जाए।
यह त्योहार एक और अलग महत्त्व भी रखता है। मातृ-शक्ति अर्थात जन्म से ही मन और शरीर के अंदर जो प्रतिरोधक क्षमताएँ और शक्तियाँ हैं उन्हें जगाने, संगठित करने और बाहरी/ऊपरी व्याधियों (अर्थात रोग, मन की गिरावट और बुराइयों ) से सामना करके विजयी होने की तैयारी का अनुष्ठान है। दुर्गासप्तशती को बार-बार पढ़ने पर यह सब स्वयं स्पष्ट हो जाता है। साल में दो बार पुनर्जागरण की विधि कही गयी हैं इसीलिए दो बार नवरात्र महोत्सव मनाया जाता है।
मौसम के संधिकाल में प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर होने के कारण वात, पित्त और कफ़ के प्रकोप से पैदा हुईं व्याधियों को दूर के लिए यह पारायण कहा गया है। इसलिए इसे मात्र उत्सव न समझकर स्वास्थ्य के लिए आवश्यक क्रिया भी जानना चाहिए। फलाहार और ध्यानासन करके सप्ताह बिताना चाहिए।
Entry Filed under: Uncategorized. Tags: सुरेन्द्र सिहं राठ.
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1.
kemssr | November 19, 2007 at 9:56 pm
सुरेन्द्र सिहं राठौर
2.
kemssr | November 19, 2007 at 9:58 pm
हम लोग इस कार्य को करने के लिए जो